786>|| आपलोग हैं कैसे ||

  786>|| आपलोग हैं कैसे ||

           <--©--आद्यनाथ--->


आपलोग कैसे हैं,

मुझे मालूम नेही हैं।

मालूम करने के चाहत हैं,

मग़र जवाब नहीं मिलते हैं।

मनमे उत्सुक हूँ,

फिरभी चुप रहते हूँ।

आपने आपसे पूछते हूँ,

सबको याद करते हूँ।

केया हैं नाता आपसे हमसे,

किउ जवाब देंगे दिलसे।

दिल खोजे तो शून्यमें ऊलझे।

प्यार खोजे तो रिस्ता कैसे।

अभी शरीर से लाचार, 

बाहर में करोना की अत्याचार।

दिनभर लड़ाई बीमार्से,

प्रतिख्या आप लोगोका समाचार के।

हो सके, याद करते हैं, आपलोक हमे,

मैं कभी ना भुल पाऊँ आप सब के।

त्रिश साल के रिश्ते याद आते।


बईठे थे नदी किनारे एकला,

देखते रहा तरंग कैसे  छलकाते।

किनारा का मिट्टी कैसे  गिरते,

गृह बासी सब हां हां कार करते।

टूटा घर धंसा जमीन,

नदियों के किनारे रहने वालों का दर्द, 

नदी जमीन काटती है, 

जिस तरह आरी पेड़ को काटती है। 

नदियां जीवनदायिनी हैं,

मगर हर साल तबाही लाती हैं।


किसको प्यारा कौन,

जान पाय कौन,

आज जो प्यारा, काल बनेंगे खतरा,

सबको प्यार हैं अपना,

किन्तु कोन जाने, कोन किसका आपना।

सारे दुनिया हीं आपना

सदा रखोते हैं इस भाबना।

कुछ पानेका नेही हैं भाबना,

समझना मुश्किल सबको भाबना।

====== <--©--आद्यनाथ--->=======


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